क्या हुआ था जब सीताराम केसरी ने सोनिया गांधी को कांग्रेस की कमान सौंपी जाने का कर दिया था इनकार, बीच बैठक के दौरान ही निकल गए थे

Sitaram Kesari refused to hand over the command of Congress: अभी हाल ही में, कैप्टन अमरिंदर सिंह के पंजाब के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा के लिए कांग्रेस विधायकों ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को अधिकृत किया. आलाकमान की तरफ से हरी झंडी मिलने के बाद ही चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया. बता दें कि, पार्टी अध्यक्ष रहते हुए सोनिया गांधी ने कई बड़े फैसले लिए और कई बदलाव भी किये. लगभग 20 सालों से कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी पर विराजमान सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) के अध्यक्ष बनने की कहानी भी काफी रोचक है. सूत्रों के अनुसार, साल 1998 में पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष बनीं सोनिया गांधी को तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी की नाराजगी का सामना करना पड़ा था. कहा जाता है कि जब पार्टी नेताओं ने केसरी से कांग्रेस (Congress) अध्यक्ष पद की कमान सोनिया गांधी को देने के लिए कहा था तो उन्होंने इसका पूरी तरह से विरोध किया था. बात इतने पर ही नहीं रुकी, वो इस काम के लिए बुलाई गई बैठक को भी बीच में ही छोड़कर चले गए थे. गौरतलब है कि, बिहार से तालुक रखने वाले सीताराम केसरी को 1996 में कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था. हालांकि केसरी के साथ कई तरह की समस्याएं भी थीं। कहा जाता है कि अंग्रेजी न जानने के कारण वे दक्षिण और उत्तर पूर्व भारत के नेताओं से बात नहीं कर सकते थे. इतना ही नहीं वे कांग्रेस के उच्च वर्ग के नेताओं को भी पसंद नहीं करते थे. जिसके कारण संगठन पर से उनकी पकड़ ढीली हो रही थी. उस समय इसका खामियाजा कांग्रेस पार्टी को भुगतना पड़ रहा था. कई दिग्गज नेता दूर हो रहे थे और इन सबका असर पार्टी पर हुआ. इस कारण, कांग्रेस को साल 1998 में हुए लोकसभा चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा. पार्टी को सिर्फ 142 सीटें मिलीं. हालांकि इस चुनाव में सोनिया गांधी ने जमकर प्रचार किया था और करीब 130 रैलियां भी की थीं. उस चुनाव के दौरान, ताबड़तोड़ की गई रैली की वजह से सोनिया गांधी कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं के दिल में जगह बनाने लगीं थी. गाहे बगाहे उनको अध्यक्ष बनाए जाने की मांग उठने लगी थी. इसी सिलसिले में उन दिनों के दिग्गज कांग्रेस नेता जितेंद्र प्रसाद पार्टी के वरिष्ठ सहयोगी प्रणव मुखर्जी से मिले और उनसे सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाए जाने का रास्ता सुझाने के लिए कहा. बता दें कि, कांग्रेस पार्टी के संविधान के अनुसार चुने गए अध्यक्ष को हटाए जाने का प्रावधान नहीं है. इस कारण जितेंद्र प्रसाद ने प्रणब मुखर्जी से मुलाकात कर ऐसा कोई रास्ता सुझाने के लिए कहा जिससे सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद से हटा कर सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाया जा सके. बाद में जितेंद्र प्रसाद के साथ ही कई और दिग्गज नेता भी सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद से हटाने की मुहिम में जुट गए. इनमें एक लोकप्रिय नाम शरद पवार का भी था. बाद में प्रणब मुख़र्जी ने सीताराम केसरी को हटाने में जुटे कांग्रेस नेताओं को एक रास्ता सुझाया और कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाने के लिए कहा. कहा जाता है कि सीताराम केसरी के सहयोगियों ने उन्हें कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक न बुलाने का सुझाव दिया. लेकिन उन्होंने यह कहते हुए टाल दिया कि यह सिर्फ 1998 में हुए आम चुनावों के खराब प्रदर्शन की समीक्षा को लेकर बुलाई गई है. आख़िरकार कांग्रेस नेताओं के कहने पर सीताराम केसरी ने 5 मार्च 1998 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाई. 24 अकबर रोड पर हुई इस बैठक में वही हुआ जिसका अंदाजा था. बैठक शुरू होने के बाद जितेंद्र प्रसाद, शरद पवार और गुलाम नबी आजाद जैसे वरिष्ठ नेताओं ने लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन और पार्टी की मौजूदा स्थिति का हवाला देते हुए सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए कहा और अपनी जगह सोनिया गांधी को नामांकित करने के लिए कहा. उस समय, इस्तीफा देने की बात सुनते ही सीताराम केसरी भड़क गए और प्रणब मुखर्जी को उनके खिलाफ षड्यंत्र रचने का दोषी ठहराने लगे. बाद में सीताराम केसरी ने गुस्से में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की उस बैठक को खत्म करने का आदेश दे दिया और अपने सहयोगी तारिक अनवर के साथ बैठक से बाहर निकल गए. लेकिन कमेटी के सारे सदस्य वहीं रुके रहे. केसरी के जाने के बाद उस समय के कांग्रेस उपाध्यक्ष जितेंद्र प्रसाद ने प्रणब मुख़र्जी से मीटिंग दोबारा से शुरू करने के लिए कहा. दोबारा इस मीटिंग शुरू होने के बाद कमेटी ने औपचारिक रूप से सीताराम केसरी के अध्यक्षीय कार्यकाल का गुणगान करते हुए सोनिया गांधी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया. पार्टी के इस फैसले की कॉपी सोनिया गांधी के घर भेज दी गई जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. सीताराम केसरी के अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान बड़े पदों पर रहे अधिकांश कांग्रेसी नेताओं को सोनिया गांधी की कमेटी में दोबारा से जगह दी गई. कहा जाता है कि सोनिया गांधी अध्यक्ष पद संभालने के बाद सीताराम केसरी से मिलने भी पहुंची और उन्हें महान नेता भी बताया था.
 

क्या हुआ था जब सीताराम केसरी ने सोनिया गांधी को कांग्रेस की कमान सौंपी जाने का कर दिया था इनकार, बीच बैठक के दौरान ही निकल गए थे

Sitaram Kesari refused to hand over the command of Congress: अभी हाल ही में, कैप्टन अमरिंदर सिंह के पंजाब के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा के लिए कांग्रेस विधायकों ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को अधिकृत किया. आलाकमान की तरफ से हरी झंडी मिलने के बाद ही चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया. बता दें कि, पार्टी अध्यक्ष रहते हुए सोनिया गांधी ने कई बड़े फैसले लिए और कई बदलाव भी किये. लगभग 20 सालों से कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी पर विराजमान सोनिया गांधी ( Sonia Gandhi) के अध्यक्ष बनने की कहानी भी काफी रोचक है. सूत्रों के अनुसार, साल 1998 में पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष बनीं सोनिया गांधी को तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी की नाराजगी का सामना करना पड़ा था. कहा जाता है कि जब पार्टी नेताओं ने केसरी से कांग्रेस ( Congress) अध्यक्ष पद की कमान सोनिया गांधी को देने के लिए कहा था तो उन्होंने इसका पूरी तरह से विरोध किया था. बात इतने पर ही नहीं रुकी, वो इस काम के लिए बुलाई गई बैठक को भी बीच में ही छोड़कर चले गए थे. गौरतलब है कि, बिहार से तालुक रखने वाले सीताराम केसरी को 1996 में कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था. हालांकि केसरी के साथ कई तरह की समस्याएं भी थीं। कहा जाता है कि अंग्रेजी न जानने के कारण वे दक्षिण और उत्तर पूर्व भारत के नेताओं से बात नहीं कर सकते थे. इतना ही नहीं वे कांग्रेस के उच्च वर्ग के नेताओं को भी पसंद नहीं करते थे. जिसके कारण संगठन पर से उनकी पकड़ ढीली हो रही थी. उस समय इसका खामियाजा कांग्रेस पार्टी को भुगतना पड़ रहा था. कई दिग्गज नेता दूर हो रहे थे और इन सबका असर पार्टी पर हुआ. इस कारण, कांग्रेस को साल 1998 में हुए लोकसभा चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा. पार्टी को सिर्फ 142 सीटें मिलीं. हालांकि इस चुनाव में सोनिया गांधी ने जमकर प्रचार किया था और करीब 130 रैलियां भी की थीं. उस चुनाव के दौरान, ताबड़तोड़ की गई रैली की वजह से सोनिया गांधी कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं के दिल में जगह बनाने लगीं थी. गाहे बगाहे उनको अध्यक्ष बनाए जाने की मांग उठने लगी थी. इसी सिलसिले में उन दिनों के दिग्गज कांग्रेस नेता जितेंद्र प्रसाद पार्टी के वरिष्ठ सहयोगी प्रणव मुखर्जी से मिले और उनसे सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाए जाने का रास्ता सुझाने के लिए कहा. बता दें कि, कांग्रेस पार्टी के संविधान के अनुसार चुने गए अध्यक्ष को हटाए जाने का प्रावधान नहीं है. इस कारण जितेंद्र प्रसाद ने प्रणब मुखर्जी से मुलाकात कर ऐसा कोई रास्ता सुझाने के लिए कहा जिससे सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद से हटा कर सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाया जा सके. बाद में जितेंद्र प्रसाद के साथ ही कई और दिग्गज नेता भी सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद से हटाने की मुहिम में जुट गए. इनमें एक लोकप्रिय नाम शरद पवार का भी था. बाद में प्रणब मुख़र्जी ने सीताराम केसरी को हटाने में जुटे कांग्रेस नेताओं को एक रास्ता सुझाया और कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाने के लिए कहा. कहा जाता है कि सीताराम केसरी के सहयोगियों ने उन्हें कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक न बुलाने का सुझाव दिया. लेकिन उन्होंने यह कहते हुए टाल दिया कि यह सिर्फ 1998 में हुए आम चुनावों के खराब प्रदर्शन की समीक्षा को लेकर बुलाई गई है. आख़िरकार कांग्रेस नेताओं के कहने पर सीताराम केसरी ने 5 मार्च 1998 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाई. 24 अकबर रोड पर हुई इस बैठक में वही हुआ जिसका अंदाजा था. बैठक शुरू होने के बाद जितेंद्र प्रसाद, शरद पवार और गुलाम नबी आजाद जैसे वरिष्ठ नेताओं ने लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन और पार्टी की मौजूदा स्थिति का हवाला देते हुए सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए कहा और अपनी जगह सोनिया गांधी को नामांकित करने के लिए कहा. उस समय, इस्तीफा देने की बात सुनते ही सीताराम केसरी भड़क गए और प्रणब मुखर्जी को उनके खिलाफ षड्यंत्र रचने का दोषी ठहराने लगे. बाद में सीताराम केसरी ने गुस्से में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की उस बैठक को खत्म करने का आदेश दे दिया और अपने सहयोगी तारिक अनवर के साथ बैठक से बाहर निकल गए. लेकिन कमेटी के सारे सदस्य वहीं रुके रहे. केसरी के जाने के बाद उस समय के कांग्रेस उपाध्यक्ष जितेंद्र प्रसाद ने प्रणब मुख़र्जी से मीटिंग दोबारा से शुरू करने के लिए कहा. दोबारा इस मीटिंग शुरू होने के बाद कमेटी ने औपचारिक रूप से सीताराम केसरी के अध्यक्षीय कार्यकाल का गुणगान करते हुए सोनिया गांधी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया. पार्टी के इस फैसले की कॉपी सोनिया गांधी के घर भेज दी गई जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. सीताराम केसरी के अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान बड़े पदों पर रहे अधिकांश कांग्रेसी नेताओं को सोनिया गांधी की कमेटी में दोबारा से जगह दी गई. कहा जाता है कि सोनिया गांधी अध्यक्ष पद संभालने के बाद सीताराम केसरी से मिलने भी पहुंची और उन्हें महान नेता भी बताया था.