गांधीजी के अफ्रीका जाने का आखिर क्या कारण था?

What was the reason for Gandhiji: 2 अक्टूबर यानी कि कल पूरा देश महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के 152 में जन्मदिन को मना रहा था महात्मा गांधी ने पूरी दुनिया को अहिंसा एक ऐसा मंत्र दिया था जो आज भी पूर्ण प्रासंगिक है यह जयंती ना सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में मनाया जाता है. गांधीजी के ऊपर हजारों रिसर्च (Research) हो चुके हैं और आज भी कई रिसर्च किए जा रहे हैं. गांधी जी एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके बारे में देश का हर कोई जानता है. गांधी जी उन लोगों में से हैं जिन्होंने अपने बारे में खुलकर बताने में कभी भी संकोच नहीं किया. उन्होंने अपनी आत्मकथा में बताया कि वह बचपन से ही कितने सर मिले थे एक वकील होने के नाते उनका यह गुण उनके व्यवसाय में काफी बाधक साबित हुआ. बता दें कि उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है की लंदन में वकालत करते समय गांधी जी को बहुत संघर्ष करना पड़ा. फिर भी वे लंदन की संस्कृति के साथ तालमेल बिठाने में सफल रहे. लेकिन जब वे भारत लौटे तब उन्हें अपनी वकालत करने में बहुत परेशानी हुई. उन्हें वकालत का काम नहीं मिला. यहां तक कि जिस तरह की जीवनचर्या जो उन्होंने लंदन में बना ली थी वह उन्हें खूब याद आने लगी थी, लेकिन उनकी पहली समस्या काम था और उसके लिए वे बाहर भी जाने को तैयार थे. गांधीजी को कानूनी सेवाएं देने का मौका 1893 में मिला भारतीय मूल के व्यापारी दादा अब्दुल्लाह ने दक्षिण अफ्रीका के लिए 1 साल का करार किया. गांधीजी ने इस काम को स्वीकार किया क्योंकि पहले तो उन्हें काम नहीं मिल रहा था दूसरे वे यहां की दिनचर्या से परेशान होकर भी भारत से बाहर जाना चाहते थे. इसके बाद वे अप्रैल 1993 में डरबन दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हो गए. गांधी जी में दक्षिण अफ्रीका पहुंचने से पहले कोई बहुत बदलाव नहीं आया था. वे एक जेंटलमैन की तरह वकालत करना चाहते थे. लेकिन हां लंदन जाने के बाद से ही उन्होंने दुनिया भर के धर्मों के बारे में जानना जरूर शुरू कर दिया था. गांधी जी के सत्याग्रही और महात्मा बनने की प्रक्रिया दक्षिण अफ्रीका में ही शुरू हुई थी. और उससे पहले खुद गांधी जी को नहीं पता था कि वे किस तरह के बदलाव से गुजरने वाले हैं.
 

गांधीजी के अफ्रीका जाने का आखिर क्या कारण था?

What was the reason for Gandhiji: 2 अक्टूबर यानी कि कल पूरा देश महात्मा गांधी ( Mahatma Gandhi) के 152 में जन्मदिन को मना रहा था महात्मा गांधी ने पूरी दुनिया को अहिंसा एक ऐसा मंत्र दिया था जो आज भी पूर्ण प्रासंगिक है यह जयंती ना सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में मनाया जाता है. गांधीजी के ऊपर हजारों रिसर्च ( Research) हो चुके हैं और आज भी कई रिसर्च किए जा रहे हैं. गांधी जी एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके बारे में देश का हर कोई जानता है. गांधी जी उन लोगों में से हैं जिन्होंने अपने बारे में खुलकर बताने में कभी भी संकोच नहीं किया. उन्होंने अपनी आत्मकथा में बताया कि वह बचपन से ही कितने सर मिले थे एक वकील होने के नाते उनका यह गुण उनके व्यवसाय में काफी बाधक साबित हुआ. बता दें कि उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है की लंदन में वकालत करते समय गांधी जी को बहुत संघर्ष करना पड़ा. फिर भी वे लंदन की संस्कृति के साथ तालमेल बिठाने में सफल रहे. लेकिन जब वे भारत लौटे तब उन्हें अपनी वकालत करने में बहुत परेशानी हुई. उन्हें वकालत का काम नहीं मिला. यहां तक कि जिस तरह की जीवनचर्या जो उन्होंने लंदन में बना ली थी वह उन्हें खूब याद आने लगी थी, लेकिन उनकी पहली समस्या काम था और उसके लिए वे बाहर भी जाने को तैयार थे. गांधीजी को कानूनी सेवाएं देने का मौका 1893 में मिला भारतीय मूल के व्यापारी दादा अब्दुल्लाह ने दक्षिण अफ्रीका के लिए 1 साल का करार किया. गांधीजी ने इस काम को स्वीकार किया क्योंकि पहले तो उन्हें काम नहीं मिल रहा था दूसरे वे यहां की दिनचर्या से परेशान होकर भी भारत से बाहर जाना चाहते थे. इसके बाद वे अप्रैल 1993 में डरबन दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हो गए. गांधी जी में दक्षिण अफ्रीका पहुंचने से पहले कोई बहुत बदलाव नहीं आया था. वे एक जेंटलमैन की तरह वकालत करना चाहते थे. लेकिन हां लंदन जाने के बाद से ही उन्होंने दुनिया भर के धर्मों के बारे में जानना जरूर शुरू कर दिया था. गांधी जी के सत्याग्रही और महात्मा बनने की प्रक्रिया दक्षिण अफ्रीका में ही शुरू हुई थी. और उससे पहले खुद गांधी जी को नहीं पता था कि वे किस तरह के बदलाव से गुजरने वाले हैं.