Holi tradition: जलती चिताओं के बीच खेली जाती है यहाँ पर होली , रंग नहीं चिता की राख लगाते हैं लोग … भारत देश में हर स्थान पर होली या fag बनाने का अलग अलग रीतिरिवाज़ (Tradition) है! कहि पर फूलों और लठ्टमार, कीचड़, तो कई इलाकों में रंगों की होली खेली जाती है! जाहिर सी बात है होली जैसा बड़ा त्यौहार (Festival) हर कोई मनाता है आप सबने भी रंगों से होली तो बहुत खेली होगी लेकिन क्या कभी ऐसी अनोखी होली के बारे में सुना जो रंगों से नही बल्कि भस्म (Ashes) (जली हुई लकड़ी की राख़) से खेली जाती है!

Holi tradition-

इतना ही नहीं बल्कि दुनिया के अलग-अलग देशों में फल-फूल से लेकर रंगों की होली खेली जाती है, लेकिन धर्म की नगरी काशी में चिता की राख के साथ होली खेली जाती है! जी हां, वाराणसी के मणिकर्णिका घाट (Manikarnika Ghat) पर शिव भक्त भगवान शिव से होली खेलते हैं! ये होली रंग-गुलाल से नही बल्कि चिटा की राख से खेली जाती है! ये भस्म शमशान में जलने वाले मृत शरीरों की राख होती है!

वाद्ययंत्रों (Musical Instrument) की ध्वनि से गूंजता है श्मशान-

बता दें कि रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन यहां आकर बाबा मशान नाथ (Massan Nath) की आरती कर चिता से राख की होली शुरू करते हैं! दाहकर्म (Cremation) के दौरान शोक में डूबे लोगों पर संगीत के बादल छा जाते हैं! चिताओं के पास 51 वाद्ययंत्रों (Musical Instrument) से चिताओं पर लेटे शव शिव को समर्पित कर दिए जाते हैं! Dhol और डमरू के साथ पूरा शमशान हर-हर महादेव के उद्घोष से गुंजायमान होता हैं! 11 जोड़ी तबलों के साथ पखावज, मृदंग, ढोलक (Dholak) और ढोल (Dhol) से एक साथ उठने वाली अनुगूंज जिसमें झूमते भक्त एक दूसरे पर भस्म मलते हैं!

भगवान शिव गौना करके लौटते हैं-

इस होली की शुरुआत एकादशी के बाबा विश्वनाथ (Vishwanath) के दरबार से होती है! साधु-संत माता पार्वती को गौना कराकर लौटते हैं! अगले दिन बाबा विश्वनाथ काशी (Kashi) में अपने चहेतों, जिन्हें शिवगण भी कहा जाता है अपने चेलों भूत-प्रेत के साथ होली खेलते हैं!

क्या है मान्यता-

दरअसल ऐसी मान्यता है कि भगवान शंकर महाश्मशान (Mahashamshan) में चिता भस्म की होली खेलते हैं! ये सदियों पुरानी प्रथा काशी में चली आ रही है! होली काशी में मसाने की होली (Holi) के नाम से जानी जाती है! इस होली को खेलने वाले शिवगणों को ऐसा प्रतीत होता है कि वह भगवान शिव के साथ होली खेल रहे हैं! इसलिए काशी के साधु संत और आम जनता भी महाश्मशान (Mahashamshan) में चिता भस्म की होली खेलते हैं!

सैकड़ों सालों से चली आ रही है परंपरा-

वाराणसी के विद्वानों की माने तो यहां ये परंपरा सालों से नहीं बल्कि कई सालों से चली आ रही है! हर साल इसका इसी तरह आयोजन किया जाता है! इसको देखने के लिए देश विदेश से हर साल बड़ी संख्या में लोग आते हैं! विदेशियों (Foreigner) के बीच इसका खासा चाव है कई विदेशी नागरिक तो हर साल इसको देखने आते हैं!

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By dp

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