इसको कहते हैं तकनीक, देसी गाय का गोबर किया इस्तेमाल, बना दिया वैदिक प्लास्टर और आज लाखों में कमा रहे हैं डॉक्टर साहब

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This is called technology: आज हर कोई इको फ्रेंडली और सस्टेनेबल घर बनाना चाहता है. एक ऐसा जो हमारे स्वास्थ्य पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ किफायती भी हो इन सब को देखते हुए डॉक्टर शिव दर्शन मलिक ने गाय के गोबर का इस्तेमाल कर, इको फ्रेंडली वैदिक प्लास्टर का अविष्कार किया है, जिस से बने हुए मकान गर्मियों में भी ठंडक का एहसास देते हैं.

पर्यावरण में रुचि रखते हैं डॉक्टर मलिक

हम आपको बता दें कि डॉ. मलिक मूल रूप से, रोहतक में मदीना गांव के रहने वाले हैं. गांव से होने के कारण वह हमेशा से खेती, गोशाला, पशुपालन आदि गतिविधियों से जुड़े रहे हैं. उनकी शुरुआती पढ़ाई, हिसार में कुंभा खेड़ा गांव के गुरुकुल में हुई थी और उन्होंने केमिस्ट्री में पीएचडी की डिग्री हासिल की है.

उन्होंने पीएचडी करने के बाद कुछ समय तक केमिस्ट्री के प्रोफेसर के तौर पर भी काम किया. हालांकि, वह अपने काम से खुश नहीं थे। वह हमेशा से रिन्युएबल एनर्जी, सस्टेनेबिलिटी और पर्यावरण के क्षेत्र में कुछ करना चाहते थे. उन्होंने साल 2000 में IIT दिल्ली के साथ मिलकर, गोशाला से निकलने वाले वेस्ट और ऐग्री-वेस्ट से ऊर्जा बनाने के प्रोजेक्ट पर काम किया था.

उन्होंने बताया कि मैं किसान परिवार से ताल्लुक रखता हूँ, इसलिए मैं हमेशा से ही गांव में मौजूद संसाधनों का सही रूप में इस्तेमाल करना चाहता था. मैं हमेशा सोचता था कि गाय के गोबर और खेतो में बेकार पड़ी चीजों को इस्तेमाल में कैसे लाया जाए. मैं इस क्षेत्र में रिसर्च कर ही रहा था कि उस दौरान मुझे IIT दिल्ली (Delhi) के साथ मिलकर, ‘Waste to Wealth’ प्रोजेक्ट पर काम करने का मौका मिला.”

वैदिक प्लास्टर की शुरुआत

डॉ. मलिक ने बताया कि वह इन दोनों प्रोजेक्ट के सिलसिले में अमेरिका, इंग्लैंड, ईरान सहित कई दूसरे देशों में जाते रहते थे. उन्होंने अमेरिका (America) में एक बार देखा कि लोग, भांग के पत्तों में चूना मिलाकर हैमक्रिट बनाते हैं और उससे घर तैयार करते हैं. वहीं से उन्हें आईडिया मिला कि वह भी गाय के गोबर का इस्तेमाल कर, प्लास्टर तैयार कर सकते हैं.

उन्होंने बताया, “मैं बचपन से गांव में देखता था कि लोग अपने घरों की पुताई गोबर से करते हैं. मैंने इससे होने वाले फ़ायदे के बारे में रिसर्च की और पाया कि गोबर का इस्तेमाल करने से, घर की दीवारें प्राकृतिक रूप से थर्मल इंसुलेटेड हो जाती हैं. जिससे ये घर गर्मी में ज्यादा गर्म नहीं होते और सर्दियों में ज्यादा ठंडे नहीं होते.” लेकिन, आज जब गांव में भी पक्के मकान बनने लगे हैं, तो उन्होंने पक्के घरों को कच्चे मकान जैसा ठंडा बनाने का एक बेहतरीन तरीका ढूंढ निकाला है.

गाय के गोबर से घरों में होने वाली पुताई के कॉन्सेप्ट को आम लोगों तक आसानी से पहुंचाने के लिए, उन्होंने 2005 में वैदिक प्लास्टर बनाया. डॉ. मलिक ने देसी गाय के गोबर में जिप्सम, ग्वारगम, चिकनी मिट्टी, नींबू पाउडर आदि चीजों को मिलाकर, वैदिक प्लास्टर तैयार किया. यह प्लास्टर आसानी से किसी भी दीवार पर लगाया जा सकता है.

वह कहते हैं, “यह प्लास्टर, किसी भी आम प्लास्टर जैसा ही मजबूत होता है और सालों तक चलता है. प्लास्टर में मौजूद गाय का गोबर, घर में नेगटिव आयन की मात्रा भी बढ़ाता है, जो स्वास्थ्य के लिए ठीक रहता है.” वैदिक प्लास्टर के आविष्कार के लिए, डॉ. मलिक को 2019 में राष्ट्रपति की ओर से ‘हरियाणा कृषि रत्न’ पुरस्कार भी मिला है.

गोबर से ईट बनाने का विचार

डॉ. मलिक कहते हैं, “गोशाला में कई टन गोबर जमा हो जाता है। मैं हमेशा सोचता रहता हूँ कि और किन तरीकों से गोबर का सही इस्तेमाल किया जा सकता है।” साल 2018 में, उन्होंने गोशाला की स्थिति सुधारने और सस्टेनेबल घर बनाने के मकसद से, गोबर की ईंट बनाना शुरू किया। उनका यह प्रयोग काफी सफल रहा।

गोबर की ईंट बनाने में ऊर्जा की बिल्कुल भी जरूरत नहीं पड़ती। हैमक्रिट और कॉन्क्रीट की तर्ज पर, उन्होंने गोक्रीट बनाया। डॉ. मलिक की मदद से गोक्रीट का इस्तेमाल कर, अब तक महाराष्ट्र के रत्नागिरी, झारखंड के चाकुलिया और राजस्थान के बीकानेर में, एक-एक कमरे बनाए गए

वैदिक प्लास्टर से लाखों की कमाई

गौरतलब है कि डॉक्टर मलिक के बीकानेर स्थित कारखाने में सलाना पांच हजार टन वैदिक प्लास्टर बनाया जा रहा है. उन्होंने बताया कि देशभर में उनके 15 से ज्यादा डीलर्स हैं. पिछले साल, उन्हें 10 लाख रुपये का मुनाफा हुआ है. वह बड़ी ख़ुशी से बताते हैं कि अब तक हजारों घरों में वैदिक प्लास्टर लगाया जा चुका है.

अंत में उन्होंने कहा कि, “प्राकृतिक चीजों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करके, हम गांव की इकॉनमी को मजबूत बनाने के साथ-साथ, भारी मात्रा में कार्बन एमिशन या कार्बन उत्सर्जन को भी कम कर सकते हैं.”

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