चिराग पासवान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को हल्के में ले गए, शिद्दत से निभाई ‘दुश्मनी’

बिहार की प्रमुख राजनीतिक दल लोजपा मैं पिछले 24 घंटे में काफी उठापटक का माहौल बना हुआ है. पशुपतिनाथ पारस जोकि हाजीपुर से पार्टी के सांसद हैं, राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान को अलग-थलग कर पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन करने का कदम उठाया. इस मामले को सुलझाने के लिए चिराग पासवान खुद पशुपतिनाथ जो कि उनके चाचा हैं उनके घर पहुंचे लेकिन उन्हें वहां भी निराशा ही हाथ लगी. लगभग डेढ़ घंटे के इंतजार के बाद भी चाचा पशुपतिनाथ पारस (Pasupatinath Paras) ने अपने भतीजे और पार्टी प्रमुख चिराग पासवान (Chirag Paswan) को मिलने का वक्त नहीं दिया. खबर है कि चिराग पासवान अपनी तरफ से अपने चाचा और बाकी सांसदों को यह प्रस्ताव दे चुके हैं कि पार्टी अध्यक्ष उनकी मां रीना पासवान (Rina Paswan) को बनाया जाए. परिवार और पार्टी का क्या फैसला होता है यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा परंतु इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में सूत्रधार के रूप में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम आ रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 2020 के बिरहा विधानसभा चुनाव के दौरान चिराग पासवान की ओर से लिए गए फैसलों से जदयू को हुए नुकसान और नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के स्वभाव को देखते हुए सूत्रधार वाली आशंकाओं को काफी ज्यादा बल मिल रहा है. 70 वर्षीय नीतीश कुमार अपने छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे हैं. राजनीति के प्रमुख कतार में पिछले 45 वर्षों से हैं. नीतीश कुमार के जीवन पर एक बार प्रकाश डाला जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस तरह से नीतीश कुमार अपने दोस्ती पूरी ईमानदारी से निभाते हैं उसी तरह से वह अपनी दुश्मनी को भी पूरी ईमानदारी और निष्ठा से निभाते हैं. शुरुआत के दिनों से ही नीतीश कुमार लोजपा के कुनबे और उसके वोट बैंक को डैमेज करते रहे हैं. या यूं कहें कि नीतीश कुमार एलजीपी की ताकत को जब चाहते हैं तब पॉलिटिकल टॉनिक के रूप में खुद के लिए उपयोग कर लेते हैं. चार मुख्य जब नीतीश कुमार ने लोजपा के कुनबे को हिला कर रख दिया वर्ष 2005के फरवरी में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में रामविलास पासवान की अगुवाई में लोजपा को 29 सीटें मिली थी. उनसे मिलकर ना लालू यादव सरकार बना पा रहे थे ना ही नीतीश कुमार. ऊपर से मुस्लिम मुख्यमंत्री की मांग को लेकर रामविलास पासवान खुद की पार्टी की ताकत दिखा रहे थे. उसी समय अचानक से यह खबर आई थी रामविलास पासवान के 29 में से 21 विधायक उनके मर्जी के विरुद्ध नीतीश कुमार को सपोर्ट करने के लिए तैयार हो गए. 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में रामविलास पासवान और लालू यादव मिलकर दलित,यादव, मुस्लिम वोटरों का कॉन्बिनेशन तैयार कर रहे थे. उसी समय नीतीश कुमार ने बिहार में दलित समाज से आने वाले पासवान और कुछ जातियों को हटाकर महादलित समाज का गठन किया. इतना ही नहीं, नीतीश सरकार ने महादलित समाज में आने वाली सभी जाति के लोगों को विशेष सुविधाएं दी. नीतीश के इस बड़े फैसले से रामविलास पासवान को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा. 2014 में रामविलास पासवान इंडिया में शामिल होकर फिर से अपनी पार्टी को मजबूत करने में जुटे थे तभी नीतीश कुमार ने 2016 में फिर से बीजेपी से हाथ मिला कर रामविलास पासवान की एक पार्टनर के रूप में हैसियत कम कर दी. 2020 के चुनाव में चिराग पासवान को नीतीश कुमार का विरोध करना काफी भारी पड़ा और अब ऐसी स्थिति हो गई है कि लोजपा की खुद की पार्टी खुद में ही अलग-थलग हो गई हैं. लालू यादव के खिलाफ राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए नीतीश कुमार को उस समय उपेंद्र कुशवाहा ने काफी ज्यादा मदद की थी. उन्हें इसका इनाम भी मिला था. 2004 में नीतीश कुमार ने उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बना दिया. लेकिन 2005 में उपेंद्र कुशवाहा के स्वर ही बदल गए. उसी समय अक्टूबर में जब चुनाव हुए और नीतीश कुमार को फिर से गद्दी मिली तो उसी समय उन्होंने यह फरमान निकाल दिया कि सदन में विपक्ष के नेता होने के नाते कुशवाहा को जो बंगला मिला था वह खाली कराया जाए. इस फरमान कि जब तालीम नहीं हुई तो पटना प्रशासन ने कुशवाहा का सामान तक बाहर फेंक दिया था.
 

चिराग पासवान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को हल्के में ले गए, शिद्दत से निभाई ‘दुश्मनी’

बिहार की प्रमुख राजनीतिक दल लोजपा मैं पिछले 24 घंटे में काफी उठापटक का माहौल बना हुआ है. पशुपतिनाथ पारस जोकि हाजीपुर से पार्टी के सांसद हैं, राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान को अलग-थलग कर पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन करने का कदम उठाया. इस मामले को सुलझाने के लिए चिराग पासवान खुद पशुपतिनाथ जो कि उनके चाचा हैं उनके घर पहुंचे लेकिन उन्हें वहां भी निराशा ही हाथ लगी. लगभग डेढ़ घंटे के इंतजार के बाद भी चाचा पशुपतिनाथ पारस (Pasupatinath Paras) ने अपने भतीजे और पार्टी प्रमुख चिराग पासवान (Chirag Paswan) को मिलने का वक्त नहीं दिया. खबर है कि चिराग पासवान अपनी तरफ से अपने चाचा और बाकी सांसदों को यह प्रस्ताव दे चुके हैं कि पार्टी अध्यक्ष उनकी मां रीना पासवान (Rina Paswan) को बनाया जाए. परिवार और पार्टी का क्या फैसला होता है यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा परंतु इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में सूत्रधार के रूप में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम आ रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 2020 के बिरहा विधानसभा चुनाव के दौरान चिराग पासवान की ओर से लिए गए फैसलों से जदयू को हुए नुकसान और नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के स्वभाव को देखते हुए सूत्रधार वाली आशंकाओं को काफी ज्यादा बल मिल रहा है. 70 वर्षीय नीतीश कुमार अपने छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे हैं. राजनीति के प्रमुख कतार में पिछले 45 वर्षों से हैं. नीतीश कुमार के जीवन पर एक बार प्रकाश डाला जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस तरह से नीतीश कुमार अपने दोस्ती पूरी ईमानदारी से निभाते हैं उसी तरह से वह अपनी दुश्मनी को भी पूरी ईमानदारी और निष्ठा से निभाते हैं. शुरुआत के दिनों से ही नीतीश कुमार लोजपा के कुनबे और उसके वोट बैंक को डैमेज करते रहे हैं. या यूं कहें कि नीतीश कुमार एलजीपी की ताकत को जब चाहते हैं तब पॉलिटिकल टॉनिक के रूप में खुद के लिए उपयोग कर लेते हैं. चार मुख्य जब नीतीश कुमार ने लोजपा के कुनबे को हिला कर रख दिया वर्ष 2005के फरवरी में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में रामविलास पासवान की अगुवाई में लोजपा को 29 सीटें मिली थी. उनसे मिलकर ना लालू यादव सरकार बना पा रहे थे ना ही नीतीश कुमार. ऊपर से मुस्लिम मुख्यमंत्री की मांग को लेकर रामविलास पासवान खुद की पार्टी की ताकत दिखा रहे थे. उसी समय अचानक से यह खबर आई थी रामविलास पासवान के 29 में से 21 विधायक उनके मर्जी के विरुद्ध नीतीश कुमार को सपोर्ट करने के लिए तैयार हो गए. 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में रामविलास पासवान और लालू यादव मिलकर दलित,यादव, मुस्लिम वोटरों का कॉन्बिनेशन तैयार कर रहे थे. उसी समय नीतीश कुमार ने बिहार में दलित समाज से आने वाले पासवान और कुछ जातियों को हटाकर महादलित समाज का गठन किया. इतना ही नहीं, नीतीश सरकार ने महादलित समाज में आने वाली सभी जाति के लोगों को विशेष सुविधाएं दी. नीतीश के इस बड़े फैसले से रामविलास पासवान को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा. 2014 में रामविलास पासवान इंडिया में शामिल होकर फिर से अपनी पार्टी को मजबूत करने में जुटे थे तभी नीतीश कुमार ने 2016 में फिर से बीजेपी से हाथ मिला कर रामविलास पासवान की एक पार्टनर के रूप में हैसियत कम कर दी. 2020 के चुनाव में चिराग पासवान को नीतीश कुमार का विरोध करना काफी भारी पड़ा और अब ऐसी स्थिति हो गई है कि लोजपा की खुद की पार्टी खुद में ही अलग-थलग हो गई हैं. लालू यादव के खिलाफ राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए नीतीश कुमार को उस समय उपेंद्र कुशवाहा ने काफी ज्यादा मदद की थी. उन्हें इसका इनाम भी मिला था. 2004 में नीतीश कुमार ने उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बना दिया. लेकिन 2005 में उपेंद्र कुशवाहा के स्वर ही बदल गए. उसी समय अक्टूबर में जब चुनाव हुए और नीतीश कुमार को फिर से गद्दी मिली तो उसी समय उन्होंने यह फरमान निकाल दिया कि सदन में विपक्ष के नेता होने के नाते कुशवाहा को जो बंगला मिला था वह खाली कराया जाए. इस फरमान कि जब तालीम नहीं हुई तो पटना प्रशासन ने कुशवाहा का सामान तक बाहर फेंक दिया था.