सेकुलरिस्म के लिए संसद भवन के भूमि पूजन को लेकर TMC ने जताया विरोध

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10 दिसंबर 2020 वह दिन होगा जब आज़ाद भारत को अपने खुद के संसद भवन निर्माण का शुभारम्भ किया जाएगा. इसके लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस प्रोजेक्ट को 2022 तक पूरा करना चाहते हैं और 10 दिसंबर को भूमिपूजन करने जा रहें हैं. लेकिन यहां पर भी सेकुलरिज्म की दुहाई देने के लिए तृणमूल कांग्रेस को आगे कर दिया गया हैं.

तृणमूल कांग्रेस की नेता ने इस भूमि पूजन का विरोध करते हुए कहा है की, “टीएमसी नए संसद भवन के निर्माण से पहले भूमि पूजन समारोह का विरोध करती है. यह कदम ‘धर्मनिरपेक्ष नहीं’ है. अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने भी सरकार की ‘प्राथमिकताओं’ पर सवाल उठाया है.” तृणमूल कांग्रेस के साथ साथ राशिद अल्वी, पीएल पुनिया जैसे कांग्रेसी और सीपीआई के नेताओं ने भी धर्मनिरपेक्षता का हवाला देते हुए बीजेपी के इस भूमि पुजन का विरोध किया हैं.

6 दिसंबर रविवार को तृणमूल कांग्रेस नेता, महुआ मोइत्रा ने एक ट्वीट करते हुए कहा की, “एक धर्मनिरपेक्ष बहु-आस्था वाले लोकतंत्र में पीएम को नए संसद भवन की आधारशिला रखनी चाहिए, न कि ‘भूमि पूजा’ करनी चाहिए. मैं इस तरफ इशारा करने के लिए हिंदू विरोधी नहीं हूँ, केवल संविधान समर्थक हूँ.”

इससे पहले 5 दिसंबर को लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिड़ला ने एक ट्वीट करते हुए लिखा था की, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 दिसंबर को नए संसद भवन का भूमि पूजन करेंगे. अक्टूबर 2022 तक निर्माण कार्य पूरा होने की संभावना है. हमारी स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगाँठ पर नई संसद में सत्र आयोजित किया जाएगा.”

आपको बता दें की भारत में सांसदों की संख्या को बढाकर 500 और भविष्य में 800 करने की हैं. ऐसे में नए संसद भवन में पहले ही लोकसभा सदस्यों के लिए लगभग 888 सीटें और राज्यसभा सदस्यों के लिए 326 सीटों का इंतजाम किया गया हैं. इसके बारे और जानकारी देते हुए बीजेपी केंद्रीय मंत्री ने भी एक ट्वीट किया.

रविशंकर प्रसाद ने अपने ट्वीट में जानकारी देते हुए कहा की, “भारत के संविधान की मूल प्रति में मौलिक अधिकारों से जुड़े अध्याय के आरम्भ में एक स्केच है जो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या वापसी का है. आज संविधान की इस मूल भावना को आप सभी से शेयर करने का मन हुआ.” ऐसे में तृणमूल कांग्रेस और अन्य पार्टियां संविधान लिखने वाले और भगवान् राम के चित्र बनाने वालों को भी ‘गैर-धर्मनिरपेक्ष’ साबित करेंगे?

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