दुनिया के सबसे बड़े कारोबारी समझौते से भारत ने किया किनारा

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चीन सहित एशिया के 15 देशों ने आपसी व्यापार को बढ़ाने के लिए RCEP यानि Regional Comprehensive Economic Partnership में आपसी समझौता कर लिया हैं. इस समझौते के तहत यह देश एक दूसरे देश में बिना किसी टैक्स के या फिर बहुत कम टैक्स पर आयात निर्यात कर सकेंगे.

आपको बता दें की इस समझौते का ब्लू प्रिंट सबसे पहले 2012 में किया गया था. इसमें आसियन के 10 देश- इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपीन, सिंगापुर, थाइलैंड, ब्रुनेई, वियतनाम, लाओस, म्यामांर और कंबोडिया के साथ चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हुए थे.

कयास लगाए गए थे की अगर भारत में कांग्रेस की दुबारा सरकार बनी तो भारत भी इस समझौते में शामिल हो जायेगा. 2014 में सरकार बदल गयी और देश में मेक इन इंडिया का बिगुल फूंका गया. कुछ साल पहले तक जहां मोबाइल से लेकर छोटे से छोटे खिलौने और बड़ी से बड़ी फ्रिज या ऐसी तक मेड इन चाइना था, वह ख़त्म होते होते मेड इन इंडिया होना शुरू हुआ.

इससे यह तो साफ़ जाहिर हो गया की मोदी सरकार इस समझौते में शामिल नहीं होगी और ऐसा हुआ भी. भारत ने अपने आत्मनिर्भर भारत के अभियान को चलाने तहत इस समझौते से किनारा कर लिया. इसका मुख्य कारण था की अगर चीन और भारत के बीच व्यापारिक शुल्क ख़त्म या कम हो गया तो लोकल मैन्यूफैक्चरर्स, कंपनियों को भारी नुकसान होता.

चिनी अखबार RECP में शामिल न होने वाले भारत के लिए Strategic Blunder जैसे शब्द का इस्तेमाल कर रहें हैं. वहीं भारत का कहना है की जब पहले चीन पर कम टैक्स था तो उसने भारत में अपना इतना सामान एक्सपोर्ट किया की छोटे और लोकल मैन्यूफैक्चरर्स, कंपनियों को तो छोड़ो बड़ी मैन्यूफैक्चरर्स, कंपनियों को भी भारी नुक्सान उठाना पड़ा था.

2007 में UPA 2 आने के बाद भारतीय बाजार में चीन का कब्ज़ा इस कदर बड़ गया था की भारतीय बाजार में मेड इन भारत का सामान भी देखना मुश्किल हो गया था. जबकि उस वक़्त दोनों देशों में कम टैक्स का समझौता हुआ था, अब अगर RECP के तहत फ्री ट्रेड का समझौता हो जाता तो मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसी योजनाएं केवल कागज़ों तक ही सिमित रह जाती.

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