हिन्दू राष्ट्र का सुप्रीम कोर्ट, नपुंसक, हरामजादा: एमनेस्टी इंडिया के पूर्व प्रमुख

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बोलने की आज़ादी यह शब्द सुनने में जितना आसान लगता हैं दरअसल उतना हैं नहीं. आज़ादी के क्या मायने है? यह कौन तय करेगा, इसकी सीमा क्या होगी यह कौन तय करेगा? क्या बोलने की आज़ादी के नाम पर हम कुछ भी बोल सकते हैं? क्योंकि अब यह आम मुद्दा नहीं रहा देश में लोग बोलने की आज़ादी के नाम पर देशविरोधी नारे और अब तो देश विरोधी बातें करने लगे हैं.

ऐसा ही एक मामला मानवाधिकार कार्यकर्ता बताने वाले और एमनेस्टी इंडिया के मुखिया रहे आकार पटेल का सामने आ रहा हैं. उन्होंने बिना किसी कारण के देश के सर्वोच्च न्यायालय के खिलाफ तिरस्कारपूर्ण टिप्पणी की हैं. वैसे आपको बता दें की यह पहला मामला नहीं हैं, इससे पहले आकार पटेल ने मुस्लिमों और दलितों को हिंसा के लिए भड़काने के लिए भी प्रयास किये थे.

अब उन्होंने शुक्रवार (जनवरी 8, 2021) को एक सेक्सिस्ट और ट्रांसजेंडर समुदाय के एक ट्वीट के जरिये देश के सर्वोच्च न्यायालय के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया हैं. उन्होंने ट्वीट पर लिखा है की, “हिन्दू राष्ट्र के सुप्रीम कोर्ट के नपुंसक जजों ने यौन शोषक मुख्य न्यायाधीश को उसी मामले में पेश होने दिया, जिसमें वो खुद ही मुख्य आरोपित हैं.”

एमनेस्टी इंडिया के मुखिया रहे आकार पटेल आगे लिखते हैं की, “इन सबके बावजूद हमें सुप्रीम कोर्ट के सामने इस तरह से घुटने टेकने हैं, जैसे डेल्फी (ग्रीक गॉड अपोलो की सैंक्चुरी) की कोई आकाशवाणी हो.” इस ट्वीट के बाद लोगों ने उन्हें लताड़ना शुरू कर दिया, मामला सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा था तो उन्होंने भी बाद में ट्वीट डिलीट कर दिया.

लेकिन यहां पर उन्होंने एक और बड़ी बेहूदी हरकत की और लिखा की उन्होंने ‘नपुंसक’ की जगह ‘हरामजादा’ शब्द इस्तेमाल करते हुए दुबारा पोस्ट कर दिया. आकार पटेल का कहना है की भारत का सुप्रीम कोर्ट केंद्र की सरकार से डरा हुआ है और उसके नीचे काम करता हैं, रंजन गोगोई ने राज्यसभा सीट के लालच में कुछ फैसले दिए हैं.

उन्होंने यह भी कहा की क्या भविष्य बच्चों को यह पढ़ाया जायेगा की देश के सर्वोच्च न्यायालय में CJI के ऊपर की यौन उत्पीड़न के मामले दर्ज़ हुए थे. उन्होंने अपने पद का गलत इस्तेमाल करते हुए असम के लोगों को प्रताड़ित किया हैं. लेकिन सवाल फिर वही हैं की क्या बोलने की आज़ादी के कोई मायने नहीं हैं? अब अगर इनको सबूत पेश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट बुलाया जाए तो मीडिया इसे लोकतंत्र की हत्या और बोलने की आज़ादी के खिलाफ बता देगी.

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