जिसका डर था वही हुआ, भारत से पंगा लेना पड़ा महंगा

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एक वक़्त ऐसा भी था जब भारत को समर्थन देते हुए तुर्की ने UNSC में स्थाई सीट की मांग की थी. फिर कुछ महीनों बाद इस्लामिक देशों का केंद्र बनने की चाह रखने वाले तुर्की (Turkey) के राष्ट्रपति एर्दोगन (Erdogan) ने भारत के खिलाफ जाकर पाकिस्तान का समर्थन देना शुरू कर दिया. जिसके बाद फिर CAA, NRC और कश्मीर के मुद्दे पर तुर्की भारत के खिलाफ ही नज़र आया.

इसके पीछे तुर्की के राष्ट्रपति यह तर्क देते हैं की दुनिया में जिस देश में मुस्लिमों पर अत्याचार होगा, वह उस देश के खिलाफ अपने मुस्लिम भाइयों के लिए खड़े हो जाएंगे. दरअसल चीन (China) में मजूद उइगर मुस्लिमों के रीती रिवाज़, भाषा और रहन सहन तुर्की के लोगों की तरह ही हैं. लेकिन चीन की वामपंथी सरकार के अत्याचारों से तंग आकर 1950 के बाद से कई उइगर मुस्लिम (Uighur Muslims) चीन से भागकर तुर्की में शरण ले चुके हैं.

यही कारण हैं की चीन की वामपंथी सरकार तुर्की की सरकार से एक समझौता करना चाहती थी. इस समझौते के तहत वह अपने देश से भागे हुए लोगों को कानूनी रूप से चीन वापिस डिपोर्ट करवा सकती थी. क्योंकि यह उइगर मुस्लिम टर्की में रहते हुए चीन के अत्याचारों का भांडा पूरी दुनिया में फोड़ते हैं, जिस वजह से चीनी सरकार (Chinese Government) की छवि खराब होती हैं.

दुनिया भर में मुस्लिमों में मसीहा बनने का सपना लिए एर्दोगन भी 2017 में चीन की इस चाल को भांप नहीं पाए और उन्होंने इस समझौते पर साइन कर दिए. यह समझौता एर्दोगन के चीनी दौरे पर हुआ था, लेकिन तुर्की वापिस आते ही इनका बहुत ज्यादा विरोध हुआ और इसी वजह से यह बिल कभी संसद में पास ही नहीं हुआ.

लेकिन अब तुर्की (Turkey) के राष्ट्रपति एर्दोगन (Erdogan) पूरी तरह से फस चूके है, दरअसल चीन ने तुर्की के आगे शर्त रखी है की अगर आपको कोरोना वैक्सीन चाहिए तो इस बिल को संसद में पास करो. दरअसल तुर्की ने पाकिस्तान और चीन को खुश करने के लिए चीन की कंपनी की सिनोवै वैक्सीन (Sinovac Vaccine) को मंजूरी दी थी. अब अगर वह इस डील को तोड़कर भारत की वैक्सीन को मंजूरी देता है तो एर्दोगन एक साथ दो देशों को नाराज़ कर लेगा और अगर वह मंजूरी नहीं देता तो तुर्की के संसद में इस बिल के पास होते ही गृह युद्ध छिड़ने की सम्भावना हैं.

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