प्रणब मुखर्जी की किताब में खुलासा भारत का हिस्सा होता नेपाल लेकिन नेहरू

क्या आप सोच सकते है की जो नेपाल आज चीन की गोद में बैठकर भारत के साथ रिश्ते खराब करने को लगा हुआ हैं. वह भारत का एक अभिन्न अंग हो सकता था, यानी वह भारत का एक राज्य बन सकता था. इस बात को पहले भी कई बार उठाया गया है लेकिन अक्सर कोंग्रेसी नेता इसे एक अफवाह बताया करते थे. अब दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब द प्रेसिडेंशियल इयर्स (The Presidential Years) में इस बात का जिक्र किया है की, "देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नेपाल के भारत में विलय का राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह के ऑफर को ठुकरा दिया था. नेपाल में राजशाही और राणा के शासन के बाद राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह ने नेहरू को यह प्रस्ताव दिया था कि नेपाल को भारत का एक प्रांत बना दिया जाए, लेकिन तब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था. उनका मानना था कि नेपाल को एक स्वतंत्र राष्ट्र ही बने रहना चाहिए." इस पुरे वाक्य का जिक्र द प्रेजिडेंशल इयर्स’ के 11वें चैप्टर में माई प्राइम मिनिस्टर: डिफरेंट स्टाइल्स, डिफरेंट टेम्परेंमेंट्स’ शीर्षक के अंदर किया गया हैं. हालाँकि प्रणब मुखर्जी ने कहा की अगर इस मौके पर इंदिरा गाँधी अपने पिता की जगह प्रधानमंत्री होती तो वह इस मौके को कभी भी हाथ से जाने नहीं देती. इस किताब में 2014 में UPA की लोकसभा में करारी हार की वजह उन्होंने सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह को बताया था. इस किताब में ऐसे-ऐसे खुलासे किये गए हैं की अगर प्रणब मुखर्जी जिन्दा होते तो कांग्रेस के कुछ नेता उनको इस किताब के लिए कई तरह के केस डाल देते. प्रणब मुखर्जी ने अपनी इस किताब में 2014 लोकसभा चुनाव में मिली हार को लेकर लिखा है की, "कांग्रेस के कुछ सदस्यों का यह मानना रहा है कि अगर 2004 में मैं प्रधानमंत्री बन गया होता तो संभवत: 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की भारी पराजय नहीं होती. हालांकि मैं इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हूं, लेकिन मुझे विश्वास है कि राष्ट्रपति के रूप में मेरे पदभार ग्रहण करने के बाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अपना फोकस खो दिया."
 

प्रणब मुखर्जी की किताब में खुलासा भारत का हिस्सा होता नेपाल लेकिन नेहरू

क्या आप सोच सकते है की जो नेपाल आज चीन की गोद में बैठकर भारत के साथ रिश्ते खराब करने को लगा हुआ हैं. वह भारत का एक अभिन्न अंग हो सकता था, यानी वह भारत का एक राज्य बन सकता था. इस बात को पहले भी कई बार उठाया गया है लेकिन अक्सर कोंग्रेसी नेता इसे एक अफवाह बताया करते थे. प्रणब मुखर्जी की किताब में खुलासा भारत का हिस्सा होता नेपाल लेकिन नेहरू अब दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब द प्रेसिडेंशियल इयर्स (The Presidential Years) में इस बात का जिक्र किया है की, "देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नेपाल के भारत में विलय का राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह के ऑफर को ठुकरा दिया था. नेपाल में राजशाही और राणा के शासन के बाद राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह ने नेहरू को यह प्रस्ताव दिया था कि नेपाल को भारत का एक प्रांत बना दिया जाए, लेकिन तब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था. उनका मानना था कि नेपाल को एक स्वतंत्र राष्ट्र ही बने रहना चाहिए." इस पुरे वाक्य का जिक्र द प्रेजिडेंशल इयर्स’ के 11वें चैप्टर में माई प्राइम मिनिस्टर: डिफरेंट स्टाइल्स, डिफरेंट टेम्परेंमेंट्स’ शीर्षक के अंदर किया गया हैं. हालाँकि प्रणब मुखर्जी ने कहा की अगर इस मौके पर इंदिरा गाँधी अपने पिता की जगह प्रधानमंत्री होती तो वह इस मौके को कभी भी हाथ से जाने नहीं देती. इस किताब में 2014 में UPA की लोकसभा में करारी हार की वजह उन्होंने सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह को बताया था. इस किताब में ऐसे-ऐसे खुलासे किये गए हैं की अगर प्रणब मुखर्जी जिन्दा होते तो कांग्रेस के कुछ नेता उनको इस किताब के लिए कई तरह के केस डाल देते. प्रणब मुखर्जी की किताब में खुलासा भारत का हिस्सा होता नेपाल लेकिन नेहरू प्रणब मुखर्जी ने अपनी इस किताब में 2014 लोकसभा चुनाव में मिली हार को लेकर लिखा है की, "कांग्रेस के कुछ सदस्यों का यह मानना रहा है कि अगर 2004 में मैं प्रधानमंत्री बन गया होता तो संभवत: 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की भारी पराजय नहीं होती. हालांकि मैं इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हूं, लेकिन मुझे विश्वास है कि राष्ट्रपति के रूप में मेरे पदभार ग्रहण करने के बाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अपना फोकस खो दिया."